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Sunday, May 12, 2013

'ऐ माँ !'

जब पहली बार आँख खुली तो 
गोदी में मुझे थामे 
दुनिया से परिचित कराने को 
एक मुस्कान लिए 
तू थी वहाँ !
जब शब्दों के अभाव में खाने को रोया 
तो किलकारियों को संगीत समझ 
निवाला अपने हाथ का मुझे खिलाने को 
एक मुस्कान लिए 
तू थी वहाँ !
बढती उम्र के साथ कदम जब लड़खड़ाने लगे 
हर मोड़ पर, भरपूर स्नेह के साथ 
अपने कोमल हाथों से मुझे थामने को 
एक मुस्कान लिए 
तू थी वहाँ !
और अब भी हर पल सोने को मेरे 
अपनी गोद लिए 
आँसुओं को मेरे पोंछने को, 
जीवन को मेरे, वात्सल्य से सींचने को 
एक मुस्कान लिए
तू है वहाँ !

तभी तो माँ 
तेरी क़दमों की आहट भर से, 
तेरे होने को पहचान लेता हूँ  । 

Tuesday, July 3, 2012

'भारत' एक इमारत 


लम्बे अरसे पहले  
शाही अंदाजों में 
एक इमारत का पदार्पण हुआ,
भव्य, संपन्न और 
बेहद शालीन 
उस ईमारत ने प्रषिधि की 
ऊँचाइयों को छुआ।
जलन के प्रभाव मे
लोगों ने इसे हड़पने की 
भरषक कोशिश की,
ब्रितानी लोगों ने इसे 
अपना बनाने की साजिश की।
फिर भी लोगों का 
लगाव नहीं टूटा,
तो विवश हो ब्रितानियों ने
इसे भरपूर लूटा।
पर रंगत कम ना हुई
तो भला जलन भी कैसे जाती।
भाइयों को लडवा 
फूट डाल दी,
और ईमारत को हडपने की 
अपनी मंशा टाल दी।

फिर जो मचा भयानक कोहराम 
भाइयों का साथ रहना हो गया हराम।
सहमती से दोनों ने 
ईमारत को बाँट लिया,
खूबसूरती तो छंटी ही 
पर लगा जैसे 
ईमारत का कलेजा ही काट लिया।
फिर भी अपने हिस्से को 
बेहतर बनाने की होड़ ने
एक बेहतर भविष्य की 
राह सुझायी,
पर तब भी लालच भरी
फितरत ना शरमाई।
अपने ही घर मे चोरी-चाकरी, 
लूटपाट को न बंद होने दिया,
अपने ही माँ-बाप, भाई-बन्धु को 
ना चैन से सोने दिया।

पर उम्मीद तब भी सलामत थी,
भले ही आने वाली कयामत थी।
धीरे-धीरे सबको 
अपने से मतलब होने लगा,
सियासी राज के चलते 
नेक आदमी सोने लगा।

बात ये इतनी भी पुरानी नहीं,
मेरी कही, कोई काल्पनिक कहानी नहीं ।

जर-जर हो चुकी है ये ईमारत
पता नहीं किस पल गिर जाये,
कोशिश बहुत करता हूँ
कहीं से तोड निकले इन सियासी हमलों का 
ताकि ये झुकी ईमारत फिर संभल जाये।
आखिर घर है ये मेरा, 
शाम भी यहीं होनी है तो 
देखना भी है यहीं सवेरा।
फरियाद करता हूँ 
उस प्रभु से 
की काले बदल छंट जाये,
बची-खुची ईमारत भी 
कहीं ना बाँट जाये।
कहीं लूट न ले जालिम 
इसकी सुन्दरता, 
फिर से आ जाये वो 
भव्य-संपन्न-एकता।

Thursday, June 7, 2012

कवि की कल्पना 


कल्पनाएँ, हकीकत के धरातल पर,
उतरी  है, कलम के सहारे,
जब रचे है किसी लेखक-कवि ने,
स्वांग, अद्भुत-विचित्र-न्यारे।

थे बेरंगी मिजाज़ मे गोते लगाते, 
हतोत्साहित, ख्वाब कुछ कुँवारे, 
जम्हाई लेते, ना राह  तकते,
वीरान-म्लान, तट हमारे। 

कवि तेरी प्रत्यय-उपसर्ग की क्रीड़ा ने, 
अलंकृत कर, ख्वाब है सवारे,
उन्मोदित-हर्षित, पूरवी की राग से, 
देखो, पुकारते ये किनारे ।

बेजान-नीरस  जिंदगी की जदोजहद मे,
नज़र किये है, कई अहसास  प्यारे,
कल्पनाओं ने कवि तेरी, बुने है,
स्वपन, विशिष्ट-मंजुल -प्यारे ।


Tuesday, June 5, 2012

अनकहे जज्बात

वक्त-बेवक्त ये आन्हें,
इक आरजू इठलाई सी|

बेगैरती इस लबादे मे,
इक चाहत शरमाई सी।

शोखियों में रमी हुई,
कुछ यादें धुंधलाई सी |

बारिश मे प्रत्यक्ष  होती 
कुछ आँखे भरमाई सी।

सोती अनजानी कोख में
इक तमन्ना सहलाई सी |

दिलो-दिमाग में घर हुई 
सोच इक बहकाई सी।


Wednesday, May 23, 2012

क्यूँ ?


क्यूँ तुझे दूँ मै राग अपनी?
क्यूँ तुझे झूले पे बिठाऊँ ?
भीगे चाहे सर्द  के मौसम में,
क्यूँ तेरी और कदम बढाऊँ?

क्यूँ सलामती की खातिर तेरी ,
सर मजारों पे झुकाऊँ ?
जो अछूत माने तू मुझे,
क्यूँ तुझे पानी मै पिलाऊँ?

क्यूँ परवाह करूँ तेरी,
ना  इस सच  को झुठ्लाऊँ?
आजमाते मुद्दतें गुजरी,
क्यूँ तुझे फिर आजमाऊँ?

क्यूँ दर्द  को रोकूँ तुझसे?
क्यूँ खुद दर्द  में भीग जाऊँ?
जो प्यार तुझे ना मुझसे,
क्यूँ तुझपे मै प्यार लुटाऊँ?

Thursday, February 24, 2011

'परमसत्य' 

कल मैंने एक सत्य जाना |
अपने आँगन में बैठा 
खुशियाँ गिन रहा था,
तभी नजर को,
एक पैगाम आया |
मेरी खुशियाँ किसी मातम की संगी थी |
कहने को वो अपना नहीं था,
पर चेहरे बदलते देर कहाँ लगती है |
कुछ पल सदियों से बीते,
हर सोच में अपनों के चेहरे थे |
गम शायद देहांत का नहीं
पर सोच का था,
सब एक बुरे सपने सा था 
पर था तो परम सत्य | 

Thursday, November 25, 2010

"लिखने को "

लिखने को मैं बेवफाई लिख दूँ 
पर प्यार की तोहमत मुझे जीने नहीं देगी |

तेरे चेहरे की कशिश में, साँसें मैं अपनी भूल जाऊँ
पर सोच एक ऐसी मुझे साँस लेने नहीं देगी |

लिखने को मैं प्यार का तराना लिख दूँ   
पर यादें तेरी, गीत मुझे गाने नहीं देगी |   

तेरी फूलों सी काया के साये में, सपनो की जन्नत घूम आऊँ
पर आहट मुरझाये फूलों की मुझे नींद लेने नहीं देगी |

लिखने को तेरी-मेरी दास्ताँ लिख दूँ 
पर सोच तेरी बेवफाई की, मुझे लिखने नहीं देगी |     

Thursday, October 28, 2010

"शाम" 
 


धुंधलाई सी शाम
यादों के आँचल में,
कुछ यूँ गुनगुनाती है |

की जैसे सपने कई अधूरे
इक उड़न-खटोला लेकर
मुझसे बतियाने आते है |

दिल का दर्द
भरमाई आँखों के
अश्क बयां करते हैं |

 कसी बेड़ियों को 
तोड़ने को दिल मचलता है,
देख हालत ऐसे
तकदीर भी शरमाती है |

धुंधलाई सी शाम
यादों के आँचल में,
कुछ यूँ गुनगुनाती है |

Saturday, April 24, 2010


पहलु वक़्त के
   
   जब सुबह ढलती है  ,
अँधेरा हो जाता है |
आशाएं डुब जाती है ,
निराशाएं घिर आती है |
आसमान  से सूरज कहीं खो जाता है |  
दिलो-दिमाग में द्वंद्व शुरू हो जाता है |
स्वघटित घटनाओं का मंजर 
उभर आता है |
जब सुबह ढलती है  ,
अँधेरा हो जाता है |


एक रौशनी दिखती है
इस अँधेरे को चीरने को ,
विवेक से काम लेने पर दिमाग भी 
साथ देता है
इस परिस्थिति से निकलने को ,
और फिर वो सुबह रूपी आशा 
नज़र आती है
दूर चमकने को ,
मन कह उढ़ता है 
मंजिल तक पहुँचने को ,
फिर हिम्मत कर निकल पड़ते है ,
मंजिल मिल जाती है |
सुबह हो जाती है , 
शाम चली जाती है |


(I wrote this when I was in 8th class and this is my first poem.)