Thursday, June 7, 2012

कवि की कल्पना 


कल्पनाएँ, हकीकत के धरातल पर,
उतरी  है, कलम के सहारे,
जब रचे है किसी लेखक-कवि ने,
स्वांग, अद्भुत-विचित्र-न्यारे।

थे बेरंगी मिजाज़ मे गोते लगाते, 
हतोत्साहित, ख्वाब कुछ कुँवारे, 
जम्हाई लेते, ना राह  तकते,
वीरान-म्लान, तट हमारे। 

कवि तेरी प्रत्यय-उपसर्ग की क्रीड़ा ने, 
अलंकृत कर, ख्वाब है सवारे,
उन्मोदित-हर्षित, पूरवी की राग से, 
देखो, पुकारते ये किनारे ।

बेजान-नीरस  जिंदगी की जदोजहद मे,
नज़र किये है, कई अहसास  प्यारे,
कल्पनाओं ने कवि तेरी, बुने है,
स्वपन, विशिष्ट-मंजुल -प्यारे ।


Tuesday, June 5, 2012

अनकहे जज्बात

वक्त-बेवक्त ये आन्हें,
इक आरजू इठलाई सी|

बेगैरती इस लबादे मे,
इक चाहत शरमाई सी।

शोखियों में रमी हुई,
कुछ यादें धुंधलाई सी |

बारिश मे प्रत्यक्ष  होती 
कुछ आँखे भरमाई सी।

सोती अनजानी कोख में
इक तमन्ना सहलाई सी |

दिलो-दिमाग में घर हुई 
सोच इक बहकाई सी।


Monday, June 4, 2012

हाल-चाल

परम पूज्य नेताजी,

मैं यहाँ कुशल पूर्वक हूँ और आशा करता हूँ की आपकी भी गति-दुर्गति  नहीं हुई होगी। अब क्या है न की भले की कामना तो आजकल कर ही नहीं सकते, पता नहीं कब कौनसे कांड का खुलासा हो जाये। सच बताऊँ तो आपके बिना यहाँ बड़ा सूना-सूना सा  है, जब वहाँ था तो बहुत हलचल थी आज नेताजी ने ये किया, आज वो...आखिर बहुत ही कर्मशील व्यक्तित्व्य के धनी जो ठहरे आप, फिर क्या फर्क पड़ता है अगर काम गलत भी हो तो! 

और भाभीजी कैसी है ? सुना है की अगले विधानसभा चुनाव मे भाभीजी खड़ी हो रही है, सुनके बहुत ही अच्छा लगा। आखिर मुन्ना को अकेले बाप से संस्कार मिले उससे बेहतर है, माँ-बाप दोनों ही दक्ष हो। वैसे भाभीजी ने पिछले खत  मे बताया था की उनकी हाई-स्कूल की फर्जी अंक-तालिका नहीं आई अभी तक, अजी! बहुत सही पैंतरा है, अगर घर का काम इतना जल्दी हो गया तो जनता बवाल न मचा देगी। आजकल तो वैसे भी युवा वर्ग बहुत ही उत्साहित है और बढ़-चढ़कर आपकी मारने मे लगा रहता है। अगली बार चुनाव के लिए किसी एक युवा  को टिकट ऑफर कर देना, सब ठंडा हो जायेगा। बाकि तो आप खुद ही बहुत समझदार है, क्या हुआ जो दसवी फैल है! भला किताबी ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान से बड़ा थोड़े ही है।

और मुन्ना कैसे है, सुना विश्व-विध्यालय का अध्यक्ष बन गया है, बिल्कुल आपके और भाभीजी के नक्शे कदम पर गया है। हाँ पर, थोड़े आश्चर्य की बात तो है की उसका भौतिक नक्शा और सीरत भाभीजी से मेल नहीं खाती...खैर आपकी माया को कौन ही समझ पाया है!

हमारे कर्ण-पटल तो बस आपका बखान सुनने को तत्पर रहते है और इन्ही क्षणों मे समाचार मिला की आपके खिलाफ मोर्चा छेडा है कुछ बहुत ही प्रभावशाली व्यक्तियों ने...इसी से स्पष्ट  है की आप खुद कितने दक्ष है अपने कर्म-क्षेत्र मे, तभी तो इतनी प्रषिधी मिली है आपको। वरना आज के जमाने मे किसके पास समय है आन्दोलन और मोर्चों के लिए। वैसे आप चिंतित तो नहीं होंगे ना इन वारदातों को लेकर? उम्मीद तो यहीं है की आप  राजनितिक तरीको से इन समस्याओं का समाधान निकाल  ही लेंगे। इक्कसवी सदी के सबसे प्रभावशाली नारे "काला धन वापस लाओ" की तो बिलकुल चिंता ना करना, एक बेहतरीन  तरकीब है, कागज के पन्नो को काला कर देंगे और थमा देंगे उनके हाथों में, जनता को कौनसा समझ आता है की काला घन क्या है।

अभी के लिए इतनी खबर पूछना ही मुनासिब समझता हूँ, कहीं ऐसा ना हो की आप नाराज हो मुझे अगवा करवा दे।
लम्बे और समर्ध जीवन जीने की इच्छाओं के साथ आपके भी उज्जवल और संगत भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएँ!

आपका शुभचिंतक ,
अज्ञात

Wednesday, May 23, 2012

क्यूँ ?


क्यूँ तुझे दूँ मै राग अपनी?
क्यूँ तुझे झूले पे बिठाऊँ ?
भीगे चाहे सर्द  के मौसम में,
क्यूँ तेरी और कदम बढाऊँ?

क्यूँ सलामती की खातिर तेरी ,
सर मजारों पे झुकाऊँ ?
जो अछूत माने तू मुझे,
क्यूँ तुझे पानी मै पिलाऊँ?

क्यूँ परवाह करूँ तेरी,
ना  इस सच  को झुठ्लाऊँ?
आजमाते मुद्दतें गुजरी,
क्यूँ तुझे फिर आजमाऊँ?

क्यूँ दर्द  को रोकूँ तुझसे?
क्यूँ खुद दर्द  में भीग जाऊँ?
जो प्यार तुझे ना मुझसे,
क्यूँ तुझपे मै प्यार लुटाऊँ?

Tuesday, May 22, 2012


शायरियाँ

v डर हैं हमें की काफिला उनके साथ जायेगा,
आखिर हर मोड़ पर रुक कर इंतज़ार करना हमारी फितरत जो हो गयी हैं |

v क्यूँ  भावों के आँचल में यूँ उलझी सी है जिन्दगी,
क्यूँ बार-बार करवटें बदल जागती-सोती सी है जिन्दगी,
ख्वाहिश है एक बार धवल राहें देखने की,
क्यूँ अपने ही फलसफों में आखिर लिपटी सी है जिन्दगी |

v वक्त बेवक्त वो आन्हें...
लगता रहा की कोई ख्वाहिस अधूरी है रही 
अरसों बाद हुए हमसे वो कुछ ऐसे मुखातिब
की दीदार उनका करने को आँखें सलामत ना रही 


v कोयले से हुए इस बदन को एक टिक्का शहादत का लगा देना,
और अगर अन्दर से खोखला ना निकलूं तो चूल्हे अपने जला लेना |


v मजार थी खुशियों की फरियादों के लिए
विश्वास से जुडी बुनियादों के लिए 
फिर क्योँ इक दिन वो रोया और कहता गया 
तुझ सा बेवफा मैंने आज तलक ना देखा |


v कहने को दिल में तमनाएं बेसुमार है
तुमसे मिलने को माँगी मन्नते हजार है
पर खुदा की रहमी तो देखो,
बनायीं ये बीच में हंसती सी दरार है |


v कल खुशियों से, हँसी ठहाकों से मेरी मुलाकात थी,
पर आज जैसे यथार्थ को भी धरातल सिमट गया हैं |

मैं मिर्ज़ा गालिब की शायरियों से बहुत प्रभावित रहा हूँ तो दो शायरियां गालिब के नाम :- 

v दुनियाँ गम--ईमान  का प्याला पीती है,
झूठी शोहरत और सिधांत का प्याला पीती है,
फिर आये कोई गालिब और बताएं,
क्या खा कर मरेगी ये दुनियाँ 


v कहता कोई गालिब कहाँ है जमाना
तोहमत हे नज़ारे पर कहाँ है फसाना
वक़्त तो ढलता सूरज ही रहा
फिर भी मुश्कियों में आबाद है आशियाना|

Monday, February 6, 2012

      खामोशी
       रात के दो बज रहे थे और सर्दी बहुत तेज हो गयी थी। इस वक्त प्लेटफार्म पर उसके और मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं था। यह एक छोटे से कस्बे फलोदी का छोटा सा प्लेटफार्म था, ईमारत के नाम पर स्टेशन मास्टर का एक छोटा सा कमरा और पक्की इंटों से बना प्लेटफार्म था। अक्सर एक चाय वाला अपना ठेला लगाता था पर वो भी साँझ ढले चला जाता था। इस पहर स्टेशन बहुत  बेरौनक, सुनसान सा था। प्लेटफार्म पर एक ट्यूब-लाइट जल रही थी, इसलिए ज्यादातर हिस्से में अँधेरा था। पूरे प्लेटफार्म पर बस दो ही बेंचें थी, एक पर वो अकेली, दूसरी पर मैं और बीच में ट्यूब-लाइट, कुछ अजीब सा रिश्ता हो गया था हम तीनों के बीच। 
       स्वाभाविकता से परे न जाते हुए मैं उसे कनखियों से निहारने लगा, बिखरे हुए बाल, बैचैन आँखें और बेहद खुबसूरत चेहरा । सर्दी से बचने के लिए उसने गर्म शाल ओढ राखी थी और उस शाल के निचे नारंगी रंग की कीमती  साड़ी । मैंने भी सर्दी से बचने के लिए अपने कोट की कॉलर खड़ी कर ली थी लेकिन शर्ट-पेंट सूती होने के कारण बहुत ठण्ड लग रही थी । वो भी थोड़ी-थोड़ी देर में मेरी तरफ देख लेती, आखिर सुनसान रात में दो अजनबियों का रिश्ता ही कुछ ऐसा हो जाता है। हालाँकि वो मेरे लिए अजनबी और में उसके लिए पर अभी तो दोनों एक ही प्लेटफार्म पर थे, मंजिल की भी कोई चिंता नहीं क्योंकि हो सकता हैं गाड़ी सुबह ही आये। अभी-अभी दिल्ली मेल बिना रुके दनदनाते हुए चली गयी और इससे पहले भी कई गाड़ियाँ यूँ ही जा चुकी थी, अभी एक और आने वाली थी पर वो भी यूँ ही निकल जानी थी , तेज चलने वाली गाड़ियाँ अक्सर छोटे स्टेशनों पर नहीं रुका करती। 
       कुछ ऐसा ही मामला जिन्दगी का भी है। हम अपना रास्ता जल्दी तय करने के लिए ना जाने कितने अपनों को पीछे छोड़ देते है, मैं भी आज बहुत कुछ पीछे छोड़ आया था। खैर जो हुआ सो हुआ, वो सब सोचने का तो वक्त नहीं था। अभी तो दिमाग में बस उसके बारे में विचार आ रहे थे वो भी अधलेटी सी शायद कुछ सोच रही थी, मुमकिन है वो भी मेरे बारे में ही सोच रही थी। लेकिन ये कौन थी, कहाँ से आ रही थी, कहाँ जाने वाली थी और ऐसे ही बहुत सारे सवाल मेरे मन को बैचैन कर रहे थे । कई बार सोचा की जाकर पूछ लेता हूँ पर फिर यही सोच कर रुक गया की कहीं वो मुझे गलत ना समझ बैठे । काफी समय बीत गया और मैं अपनी बैंच पर अधलेटी मुद्रा में सिगरेट सुलगा रहा था और मेरा पूरा रुख पूरी तरह उसकी और था , शायद इसी से असहज हो उसने अपने हैण्ड-बैग से कोई किताब निकाली और पढने की कोशिश करने लगी। वो बीच-बीच में मुझे भी देख लेती थी तो लगा शायद वो मुझे कोई बदमाश समझ रही थी और सहम गयी थी। कुसूर उसका भी नहीं, मेरी हालत ही कुछ ऐसी थी, खैर फटे हुए कमीज को तो कोट ढके हुए था। 
       इसी उधेड़बुन में सिगरेट कब खत्म हुई पता ही नहीं चला, अंतिम कश लेकर सिगरेट जोर से उछालते हुए मैंने अपने आप से कहा इस तरह तो सुबह हो जाएगी, कम से कम नाम तो पता कर ही लूँ। मैं बेंच से उठ खड़ा हुआ और छोटे छोटे कदमो से उसकी तरफ बढ़ने लगा पर जैसे ही उसके करीब से गुजरा तो कदम खुद-ब-खुद तेज हो गए और मैं उसके पास से आगे निकल गया। वो शायद घबरा गयी थी मुझे यूँ आते देख पर उसे नहीं पता था की मैं खुद भी कितना घबरा रहा था। उसका चेहरा देख तो बात करने की कशिश और भी बढ़ गयी थी। मैं अपने आप पर झलाने लगा और तय किया की वापस जाते वक्त जरुर उससे बात करूँगा। लेकिन फिर वही बात, उसके करीब जाते ही दिल की धडकनों के साथ कदम भी तेज हो गए ।
       सुनिए......
एक मीठी सी आवाज़ ने जैसे पूरे बदन में सिहरन सी पैदा कर दी थी और मैंने बिना सोचे अचानक से पीछे को देखा।
       आप कहाँ जा रहे हो? 
       जी मैं...! मैं तो....
मैं कुछ घबरा सा गया और लफ्ज जुबान से न निकल पाए। वो मुस्कुराई, शायद अपने ही डर को मारने की कोशिश कर रही थी या शायद मेरे व्यव्हार ने उसकी चिंता को खत्म कर दिया था, वो बोली...
       मेरा मतलब किस शहर को जा रहे हो?
मैं सोच में पड गया की किस शहर को जा रहा था, दरअसल इसका तो मुझे भी पता नहीं था सो मैंने उससे यही सवाल दोहरा दिया, और वो भी शायद अपने गंतव्य को लेकर सुनिश्चित नहीं थी। मैंने आश्चर्य से उसकी और देखा और मन ही मन खुश हुआ की शायद हमारी मंजिल एक ही हो जाये।
       आप अकेले है?
उसने भी जवाब को गोल कर दिया, और कहने लगी...
       आप आकर यही बैठ जायिए ना... अकेले रात काटना तो बहुत मुश्किल लग रहा है।
इतना कहना था की मैंने अपने अटेची उठाई और उसके पास आकर बैठ गया, मैंने तो ये तक तय कर लिया की जहाँ वो जाएगी वही चले चलूँगा। मैं सपनो की दुनिया में खो गया और लगा की एक कश्ती में सवार हम दोनों कही जा रहे थे और मैं उससे पूछा किस साहिल की और...मैं कुछ ज्यादा ही जोर से बोल गया था तो वो चौंक उठी।
       जी...
       माफ़ कीजिये मैं सपना देख रहा था।
       लेकिन आप सोये कब थे?
       जी, कुछ सपने खुली आँखों से भी देखे जाते हैं।
वो मुस्कुराई और इधर-उधर देखने लगी। मैंने अचानक से मौके का फायदा उढा पूछा
       आपने अपने बारे में कुछ बताया नहीं, यहीं की कहाँ से हो, कहाँ जा रही हो ?
कुछ देर सोचने के बाद, कहती है...
       अब आपसे भी क्या ही छुपाना, आज मेरी शादी का दिन था। मेरे माँ-बाप मेरी शादी एक बहुत ही गरीब घर में करवा रहे थे, कहते थे लड़का बहुत योग्य है, पर तुम ही बताओं हमेशा ऐसो-आराम में पली बढ़ी हूँ, उस घर में भला कैसे रहती।
       आपने अपना नाम नहीं बताया?
       वर्षा...
वर्षा! नाम सुनते ही मैं चौंक सा गया और अनायास ही पूछ बैठा...
       क्या आप सुरेन्द्र जी की लड़की है?
       जी हाँ... लेकिन आप कैसे...?
       जी, मैं प्रेम यादव हूँ जिससे आप की शादी होने वाली थी। मैंने इसलिए घर छोड़ा की मेरी शादी एक अमीर घर की लड़की के साथ हो रही थी और.....
मेरा वाक्य खत्म होता उससे पहले ही एक और एक्सप्रेस सीटियाँ बजाती, शोर करती बिना रुके पास से गुजर गयी।
पीछे रह गए वर्षा और प्रेम और रह गयी खामोशी। वर्षा अपनी मंजिल की तलाश में और मैं अपनी...

Thursday, February 24, 2011

'परमसत्य' 

कल मैंने एक सत्य जाना |
अपने आँगन में बैठा 
खुशियाँ गिन रहा था,
तभी नजर को,
एक पैगाम आया |
मेरी खुशियाँ किसी मातम की संगी थी |
कहने को वो अपना नहीं था,
पर चेहरे बदलते देर कहाँ लगती है |
कुछ पल सदियों से बीते,
हर सोच में अपनों के चेहरे थे |
गम शायद देहांत का नहीं
पर सोच का था,
सब एक बुरे सपने सा था 
पर था तो परम सत्य |